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Monday, July 14, 2014

The Life Line

5. जीवन तरंग

काहे को तुम गिडगिडा रहे,
पत्थर के सामने सिर फुडा रहे

जहर है जिंदगी, फिर भी पी लों,
जीना है चार दिन मजे मे जी लों

अजब है तुम्हरी अन्धभक्ति,
गजब है तुम्हरी सहनशक्ति

काहे को अपना गला दु:खा रहे,
जो है नहीं, उसको बुला रहें

बीते है बरस और बीतेंगे,
होगा वही जो करम जीतेंगे

मरुधर है जीवन, जल को भटको,
मिला थोड़ा सा धीरज धर लो

शांत नहीं होंगे ये कष्ट,
जीवन को न कर लेना भ्रष्ट

पाया है, उसमें शांत रहों,
जीवन है, जीना जीते रहों

द्वारा: राघव पुरोहित

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