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Wednesday, September 9, 2015

अनकही सच्‍चाई

अनकही सच्‍चाई
मैनें जो कही
रही जो अनकही
अंतर काफी था
तुने क्‍या समझा
मैने क्‍यों न कहा
अंतर काफी था
दिल की दिवारों में
भुकंप सा लगना
मेरा कहना-तेरा समझना
अंतर काफी था
वह सच्‍चाई -
जो न कह पाया मैं
जो न सुन पाये तुम
अंतर काफी था
क्‍यों न कह पाया
क्‍यों न सुन पाया
अंतर काफी था
दिल के वश में
दिमाग बेमेल
अंतर काफी था
वहां दूर तेरा धधकना
यहां पास मेरा तड़फना
अंतर काफी था
कोशिश फिर करेंगे
कहने-सुनने की
कम हो अंतर, यह काफी है
तेरा - मेरे लिए
मेरा - तेरे लिए
यह समझ जाना
अंतर काफी था

राघव पुरोहित
10.09.2015

Sunday, January 11, 2015

Human Behaviour - from Facebook

Part - 1 Human Behaviour
कुछ दिनों से मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने का प्रयास मात्र कर रहा हूँ। बड़ी विचित्र विचित्र बाते महसूस हो रही है। ज्ञात अज्ञात और अज्ञात ज्ञात हो रहा है।
किस तरह से पॉजिटिव नेगेटिव हो जाता है और कैसे नेगेटिव पॉजिटिव हो जाता है बहुत ही विचित्र है।
कुछ लोग आपके सामने क्या और आपके पीछे क्या होते है। मैं तो सोचता था क़ि आदमी एक दो मुखोटे ही लगाता है लेकिन कइयों के मुखोटे की गिनती कर पाना भी मुश्किल है। कुछ स्वम को होशियार समझते है लेकिन हर मोड़ पर मूर्खता दिखाते है। कुछ होशियार होते हुवे भी मुर्ख ही रहते है। कूच स्वम में इतना खो जाते है क़ि उन्हें दुसरे दिखते ही नहीं है। कुछ दूसरों को केवल खुद का स्वार्थ पूरा करने का साधन समझते है।

राघव पुरोहित
07.01.2015



रोज शाम आईने के सामने खड़े होकर खुद से माफी मांग लेनी चाहिए, क्योकि कही न कही दूसरों को खुश करने के लिए हम खुद से compromise करते है यानी अपना दिल दुखाते है और हँसते जाते है।
वरना रोज लोगो से लड़ाई करनी पड़े।
राघव पुरोहित
08.01.2015



  • Ruchi Pareek Ye duniya ka usool hai or kaliyug ka riwaz bhi jo in riwazo or usoolo ka palan karte hai aaj ki duniya main jeete bhi wahi hai or jeette (won) bhi wahi karte hai Mr Purohit.
  • DrMeghna Sharma Raghav Purohit जी ऐसे ही लोग आज मानव जाति के लिये कलंक साबित हो रहे हैं, सबसे बडी मुश्किल तो ये है कि इन लोगों की पहचान करना कठिन कार्य है और जबतक हम इन्हें पहचान पाऐं ये हमारा काफी नुकसान करने में कामयाब हो चुके होते हैं, बस ईश्वर इनकी वक्त से पहचान करवाऐ यही प्रार्थना है।
  • Raghav Purohit DrMeghna Sharma ji अपने आस पास कई मंडराते रहते है, पहचानने की कौशिश करे कामयाबी मिलेगी। आँखों को पढ़ो, चेहरे को पढ़ो। उसके शब्दों को पढ़ो, झूठ को पढ़ो, झूठ के पीछे छिपे सच को पढ़ो। सच को पढ़ो और सच के पीछे झूठ को पढ़ो। लेकिन आँख कान और दिमाग खुला रखना जरुरी है। दुनियां से ही भरोसा उठ जाएगा। लेकिन मजा भी आएगा। खुद को भी बदलना होगा।
  • Raghav Purohit जो ये कहता है कि मैं ऐसा नहीं भाई 100 प्रतिशत वो वैसा ही होगा। कुछ हमारे जैसे भी होंगे बावले जैसे है वैसे ही रहेंगे। बदलेंगे नहीं चाहे कुछ भी हो जाए
  • Giriraj Harsh राघव जी एेसे लौगो से सावधान रहो और सुरक्षित रहो तथा अच्छे लौगो को बचाकर रखो ।

Few Lines

अब ज़माना नहीं रहा, खुले में घूमने का
बंद करलो खिड़कियाँ, ठण्ड आती है।


डराना और डरना - अपनों से ?
क्यों घबराना - अपनों से !


आँखे बंद करली है मैंने
अब तुम कुछ भी बोलो
सुनाई नहीं देगा।


राघव पुरोहित
08.01.2015



हमने महसूस किया है कि
हमारे सोचने का तरीका अलग है
इसीलिए हम दुनिया से थलग है


चुप रहना मजबूरी नहीं
आदत बन चुकी है
आदमी इंसान नहीं
चीज बन चुकी है



राघव पुरोहित
07.01.2015



ये भी अच्छा कहा -
माना सच नहीं बताना हमारी मज़बूरी है
लेकिन झूठ बोलना तो जरुरी नहीं है।
समझे क्या
इसलिए हम चुप रहते है।


राघव पुरोहित
07.01.2015

शीर्षक - माटी गान साजे विधी विधान (बेसुरा)

शीर्षक - माटी गान साजे विधी विधान (बेसुरा)

हे मेरे चमन
कहाँ है करम (मस्तक/कर्तव्य)
हरा भरा
कई फूलों और पेड़ो से भरा
फिर भी
उजड़ा उजड़ा, क्यों बंजर पड़ा
कहाँ है? वो राजा!
कहाँ है? वो रंक
बजा सके जो करम का शंख
चुप क्यों कुछ मंत्री बैठे
कुछ क्यों अपनी रोटियाँ सेके
कहाँ है वो बेटे
जो स्वम की नहीं
सोचे तेरी।
धरा को कर दे अमृत
दिल नरम
कहाँ है करम
हाथ उधर
पाँव इधर
दिशा भ्रम
या
मति भ्रम
क्यों? केवल
अपने
शिख्वा और गिले
तेरे लिए
कोई न मिले
लूट ले गए दूजे
हम बैठे गए रूखे
साहस और अभिमान कहा
करम से सही ज्ञान कहा
दम्भ दम्भ केवल दम्भ
ये क्या! कर गए हम

नोट- कहानी बाकी है

राघव पुरोहित
09.01.2015