1.
हे प्रभात के पाखी,
अब मत गा तू प्रभाती|
जन्म से जो मेरे साथ था,
मुझे छोड़ गया वही सत्य साथी||
क्या से क्या हो गए है, सभी शहरी|
यह घर तो क्या पूरी नगरी हो गई है बहरी||
रो रहा है कोई मेरी बगल मे,
हंस रहा है कोई अपनी लगन में
लूट रहा है कोई किसी की अस्मत|
फोड़ रहा है, कोई किसी की किस्मत|
लक्ष्मी ओ लालच के सभी है पुजारी
आततायी और नराधम होते है यहाँ हजारी
सती फटे कपड़ो में यहाँ भीख मांग रही है
कुलटा के हाथों मे आलक्त ओ मेहंदी राच रही है|
द्वारा: श्री राम किशन पुरोहित
हे प्रभात के पाखी,
अब मत गा तू प्रभाती|
जन्म से जो मेरे साथ था,
मुझे छोड़ गया वही सत्य साथी||
क्या से क्या हो गए है, सभी शहरी|
यह घर तो क्या पूरी नगरी हो गई है बहरी||
रो रहा है कोई मेरी बगल मे,
हंस रहा है कोई अपनी लगन में
लूट रहा है कोई किसी की अस्मत|
फोड़ रहा है, कोई किसी की किस्मत|
लक्ष्मी ओ लालच के सभी है पुजारी
आततायी और नराधम होते है यहाँ हजारी
सती फटे कपड़ो में यहाँ भीख मांग रही है
कुलटा के हाथों मे आलक्त ओ मेहंदी राच रही है|
द्वारा: श्री राम किशन पुरोहित