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Monday, July 14, 2014

Enemy

8. 1 November, 1997 - Dushan

आज मैं, बेचारा हूँ
बिना चारे के फिरता मारा-मारा हूँ

एक नहीं, दो, नहीं, लाखों हैं, दुश्मन मेरे
जग मे ही नहीं, घर में भी है ठहरे

अपनों के मन में कलुषता घर कर गई,
सदभावना, भाई-चारे का क़त्ल कर गई
फैलाया है जहर, इसने हैवानियत का
पीया है लहू, इसने इंसानियत का

हर इंसान आज घुट-घुट कर मरता जा रहा
साम्राज्य पाप का, चारों तरफ फैलता जा रहा
मेरे मारने से क्या ये मरेंगे?
एक को मारूंगा, सौ सिर पर पड़ेंगे

इनके ही कई है - बहन - भाई और भौजाई,
हर जगह जिन्होंने अपनी जड़े फैलाई
भ्रष्टाचार की लुगाई है, बईमानी

डाल हाथों मे हाथ, साथ-साथ चलते है जानी
इसकी बहन रिश्वत को भी कम न समझो भाई!
हर किसी ऐरे-गेरे की जीभ पर समाई

अपने को अगर इनके शिकंजे से बचाना,
तब सब मिलकर एक हो जाना,
तब सब मिलकर एक हो जाना,
बस केवल मिलकर, एक हो जाना

द्वारा: राघव पुरोहित

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