Search This Blog

Monday, July 14, 2014

Message from Earth

1- सबसे पहले २५ मई १९९७

धरती माता का पैगाम

मेरे अन्तर्मन का द्वंद् -
आओ, तुम्हे सुनाती हूँ

अहिंसा की पुजारिन हूँ,
हिंसा पर न ऊतर आऊ,
इतना न मुझको उकसाओं

तुम जानते हो -
कहने की भी सीमा होती,
सहने की भी सीमा होती

मैं न अपनी शक्ति खो दूँ,
इतना न मुझको दुत्कारों
आसूँ नहीं मैं, लहू पी रही,
जी कर भी मैं, नहीं जी रही

तुम सब मुझको रौंद रहे हो,
जगह-जगह से खोद रहे हो
घावों में मेरे पीब भरी,
खुदको फिर भी संभालें खड़ी

इसलिए तुमको कहती जाती,
जगह-जगह समझाती जाती
समझ सको तो समझ जाओं ,
ये अकाल, बाढ़, तूफान क्यों?
ये धरती ही शैतान क्यों?

अपने को न संभाल पा रही,
घुट-घुट कर मरती जा रही

न अपनी कब्र, अपने हाथों खोदों,
कुछ बीज जीवन के बो दो
इसी में तुम्हारी जीत बसी है,
ज्योत जीवन की यही बची है

मेरे बेटों ये पैगाम आखरी,
मेरे बेटों ये पैगाम आखरी

द्वारा: राघव पुरोहित

No comments:

Post a Comment