17. संतुष्टि
उससे मेरी -
कल मुलाकात हुई,
ज्यादा नहीं ।
एक-दो बात हुई।
जो चाहा मैंने।
हॉ! मैंने दिया।
मैंने रोशनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने चांदनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने रागनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने दोस्ती! चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने दुश्मीनी कब चाही?
हॉ! मैंने मुफ्त दी।
मैंने शांति चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने अशांति कब चाही?
हॉ! तेरा बोनस।
मैंने संतुष्टि चाही,
क्यों…! मुझे देने में नहीं -
तुझे लेने में नहीं।
चल छोड़ - कुछ और मांग
लेकिन अब बंद है जुबान।
चिरशांति ! मिली, बिना मांग।।
राघव पुरोहित
उससे मेरी -
कल मुलाकात हुई,
ज्यादा नहीं ।
एक-दो बात हुई।
जो चाहा मैंने।
हॉ! मैंने दिया।
मैंने रोशनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने चांदनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने रागनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने दोस्ती! चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने दुश्मीनी कब चाही?
हॉ! मैंने मुफ्त दी।
मैंने शांति चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!
मैंने अशांति कब चाही?
हॉ! तेरा बोनस।
मैंने संतुष्टि चाही,
क्यों…! मुझे देने में नहीं -
तुझे लेने में नहीं।
चल छोड़ - कुछ और मांग
लेकिन अब बंद है जुबान।
चिरशांति ! मिली, बिना मांग।।
राघव पुरोहित
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