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Wednesday, August 6, 2014

पिताश्री द्वारा कविता Poem written by Father

1.

हे प्रभात के पाखी,
अब मत गा तू प्रभाती|
जन्म से जो  मेरे साथ था,
मुझे छोड़ गया वही सत्य साथी||


क्या से क्या हो गए है, सभी शहरी|
यह घर तो क्या पूरी नगरी हो गई है बहरी||

रो रहा है कोई मेरी बगल मे,
हंस रहा है कोई अपनी लगन में
लूट रहा है कोई किसी की अस्मत|
फोड़ रहा है, कोई किसी की किस्मत|
लक्ष्मी ओ लालच के सभी है पुजारी
आततायी और नराधम होते है यहाँ हजारी
सती फटे कपड़ो में यहाँ भीख मांग रही है
कुलटा के हाथों मे आलक्त ओ मेहंदी राच रही है|

द्वारा: श्री राम किशन पुरोहित

Lets start the mind fresh system

चेतना का चेत ना,
स्वयं की स्वयं से भेट ना!
यह क्या चेत-ना,
महामंडना-विडंबना

राघव



दिल के जख्‍म - हरे 
भरे चमन में
हरे को 
कोई तो हरे
जख्‍म न सही
दिल ही हरे
कोई तो हरे
हरे हरे

राघव


कही छुप जाती है, कही दब जाती है...
हसी हमारी जाने कब आती है...

राघव


बढे चलो जवान तुम बढे चलो
बढो न उस राह पर - जहॉ दूर तक हो हरा
हाथ में ले बीज - चमका दे पूरी धरा
फिक्र का न जिक्र हो - सोच कुछ नया-नया 
भलाई हो इंसान की - अभी है बाकी पूरी धरा

राघव

जिंदगी में
क्‍या खोया
क्‍या पाया
क्‍या लगा
क्‍या उजड़ा
अकेले है?
साथ कौन?
जिंदगी में
क्‍या दिन
क्‍या रात
क्‍या कही
क्‍या अनकही
साया है?
छाया है?
बुजते रहेंगे
बजते रहेंगे
साज है
सजते रहेंगे
लगातार
चलना है
चलते रहेंगे

बैठे-बैठे
बिल्‍कुल टाइम पास, पूरी बकवास
 


हो सकता है सामने वाले को आपकी बात पसंद न हो| ऐसी बात करो जिसे सामने वाला सुनना पसंद करता हो| उसमें आपके चाहने वालो के विपरित भी बात हो सकती है| आप सुनने वाले का चहरा पढने की कोशिश भी करे| धीरे धीरे आप expert हो जायेंगे| सामने वाले के लिए कांच (mirror) का काम करेंगे| विचार उसके होंगे लेकिन बोलेंगे आप|
सावधानीः खेलते खेलते अपनी असलीयत मत भुल जाना




कहने के लिये
उसके पास चार शब्द थे
कहने के लिए
मेरे पास दर्द भर था
मिले भी
हम किसी मोड़ पर
ना वो कुछ कह पाए
ना हम कुछ कह पाए
आँखों ने आँखों
को क्या कहा
हम वो भी नहीं समझ पाए




क्‍यों कुछ सज्‍जन दुर्जनता दिखाते है
क्‍यों सामने वाले को नीचा दिखाते हैं
क्‍यों चुप है सामने वाला
वो समझ नहीं पाते हैं
गुलाब के साथ काटे भी हो सकते हैं
क्‍यों वो समझ नहीं पाते हैं
क्‍यों कुछ दुर्जन राक्षस हो जाते हैं
खुद के लिए दूसरों को खा जाते हैं
क्‍यों चुप है सामने वाला
वो समझ नहीं पाते हैं
कोई गले में हड्डी भी हो सकता है
क्‍यों वो समझ नहीं पाते हैं
क्‍यों कुछ पढे पागल हो जाते हैं
क्‍यों कलम से चाकू चलाते हैं
कलम किसीकी तलवार भी हो सकती है
क्‍यों चुप है सामने वाला
वो समझ नहीं पाते हैं

राघव पुरोहित





Dil ki kitab ke kone me
Likha hai ek akshar
Agle panne par jaane ko kahe
Aisa hi hota hai aksar
Are bhai wo page number hai



शब्‍द Words

काश! शब्‍दों में दर्द को समझ पाता
काश! दर्द को शब्‍दों में समझ पाता
अहसास! कुछ खास, समझ पाता
तेरे जज्‍बात, हमारी बात
समझना नहीं अासान
शब्‍दों के जाल से - दर्द को
समझना नहीं आसान

Thursday, July 17, 2014

दुरियॉं The Distance

दुरियॉं The Distance

मेरी नजरों से, इतना न गिरों
कि उठाना मुश्किल हो जाये

मेरे सामने से तुम निकलों
और नजरे मिलाना मुश्किल हो जाये

मेरे जजबात, माना, पढना है मुश्किल
थोड़ा दिल मिला कर देखों
रास्‍ता आसान हो जाए

बेवफा बताने से पहले
सनम वफा तो जानी होती
दूर जाने से पहले
हकीकत तो पहचानी होती

जब घाव दिल का दिया हो
परायों को क्‍या कहे? अपने ही रूठ जाते है!
दुरियॉं दिलों की, कब्र है ए-जालिम
जिन्‍दों की क्‍या कहे, मुर्दों का दिल जला दें

हमसे शिकवा करते हो
हमारी शिकायत नहीं सुनते
यो दिल की दुरियॉं नहीं मिटाई जाती

परायों में बैठ कर
हमें और पराया पाओगे
दुरियॉं मिटाने की जगह
दुरियॉं और पाओगे

चार दिवारों से
दुनिया नहीं देखी जा सकती!
चार दिवारों से
दुनिया नहीं देखी जा सकती!

राघव पुरोहित

Monday, July 14, 2014

मुक्‍ति The Freedom

मुक्‍ति The Freedom

तुमने प्‍यार को मेरे
आंचल में छुपा लिया
यादों को मेरी तुमने
सपनों में सुला दिया

ये बेरूख ऑखें
दास्‍ताने दासता बया करती है
पास होकर भी
दूरियों का जहॉं बया करती है

जाअों! उड़ जाओं
बेमेल हैं यहॉं
मिले नया जहॉं

बंधन बांधना, बंधन छाटना
यादों में झाकना, यादों को पाटना
भुला देना, भ्‍ाुल जाना
आसां नहीं

गगन मुक्‍त है
मुक्‍त सब पंछी तारे
जाओं। उड़ जाओं
यही अंतिम घटा रे!


राघव पुराेहित
15.07.2014

Satisfaction

 17.  संतुष्टि
उससे मेरी -
कल मुलाकात हुई,
ज्यादा नहीं ।
एक-दो बात हुई।

जो चाहा मैंने।
हॉ! मैंने दिया।

मैंने रोशनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!

मैंने चांदनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!

मैंने रागनी चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!

मैंने दोस्ती! चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!

मैंने दुश्मीनी कब चाही?
हॉ! मैंने मुफ्त दी।

मैंने शांति चाही,
हॉ! मैंने दी।
कुछ पल की!

मैंने अशांति कब चाही?
हॉ! तेरा बोनस।

मैंने संतुष्टि चाही,
क्यों…! मुझे देने में नहीं -
तुझे लेने में नहीं।

चल छोड़ - कुछ और मांग
लेकिन अब बंद है जुबान।
चिरशांति ! मिली, बिना मांग।।


राघव पुरोहित
 

The Thinking

16. The Thinking

क्‍यों कुछ सज्‍जन - दुर्जनता दिखाते है
क्‍यों सामने वाले को नीचा दिखाते हैं
क्‍यों चुप है सामने वाला
वो समझ नहीं पाते हैं
 

गुलाब के साथ काटे भी हो सकते हैं
क्‍यों वो समझ नहीं पाते हैं
 

क्‍यों कुछ दुर्जन - राक्षस हो जाते हैं
खुद के लिए दूसरों को खा जाते हैं
क्‍यों चुप है सामने वाला
वो समझ नहीं पाते हैं
 

कोई गले में हड्डी भी हो सकता है
क्‍यों वो समझ नहीं पाते हैं
 

क्‍यों कुछ पढेलिखे - पागल हो जाते हैं
क्‍यों कलम से चाकू चलाते हैं
क्‍यों चुप है सामने वाला
वो समझ नहीं पाते हैं


कलम किसीकी तलवार भी हो सकती हैक्‍यों वो समझ नहीं पाते हैं 

राघव पुरोहित