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Wednesday, August 6, 2014

पिताश्री द्वारा कविता Poem written by Father

1.

हे प्रभात के पाखी,
अब मत गा तू प्रभाती|
जन्म से जो  मेरे साथ था,
मुझे छोड़ गया वही सत्य साथी||


क्या से क्या हो गए है, सभी शहरी|
यह घर तो क्या पूरी नगरी हो गई है बहरी||

रो रहा है कोई मेरी बगल मे,
हंस रहा है कोई अपनी लगन में
लूट रहा है कोई किसी की अस्मत|
फोड़ रहा है, कोई किसी की किस्मत|
लक्ष्मी ओ लालच के सभी है पुजारी
आततायी और नराधम होते है यहाँ हजारी
सती फटे कपड़ो में यहाँ भीख मांग रही है
कुलटा के हाथों मे आलक्त ओ मेहंदी राच रही है|

द्वारा: श्री राम किशन पुरोहित

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