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Sunday, January 11, 2015

Few Lines

अब ज़माना नहीं रहा, खुले में घूमने का
बंद करलो खिड़कियाँ, ठण्ड आती है।


डराना और डरना - अपनों से ?
क्यों घबराना - अपनों से !


आँखे बंद करली है मैंने
अब तुम कुछ भी बोलो
सुनाई नहीं देगा।


राघव पुरोहित
08.01.2015



हमने महसूस किया है कि
हमारे सोचने का तरीका अलग है
इसीलिए हम दुनिया से थलग है


चुप रहना मजबूरी नहीं
आदत बन चुकी है
आदमी इंसान नहीं
चीज बन चुकी है



राघव पुरोहित
07.01.2015



ये भी अच्छा कहा -
माना सच नहीं बताना हमारी मज़बूरी है
लेकिन झूठ बोलना तो जरुरी नहीं है।
समझे क्या
इसलिए हम चुप रहते है।


राघव पुरोहित
07.01.2015

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