अब ज़माना नहीं रहा, खुले में घूमने का
बंद करलो खिड़कियाँ, ठण्ड आती है।
डराना और डरना - अपनों से ?
क्यों घबराना - अपनों से !
आँखे बंद करली है मैंने
अब तुम कुछ भी बोलो
सुनाई नहीं देगा।
राघव पुरोहित
08.01.2015
हमने महसूस किया है कि
हमारे सोचने का तरीका अलग है
इसीलिए हम दुनिया से थलग है
चुप रहना मजबूरी नहीं
आदत बन चुकी है
आदमी इंसान नहीं
चीज बन चुकी है
राघव पुरोहित
07.01.2015
ये भी अच्छा कहा -
माना सच नहीं बताना हमारी मज़बूरी है
लेकिन झूठ बोलना तो जरुरी नहीं है।
बंद करलो खिड़कियाँ, ठण्ड आती है।
डराना और डरना - अपनों से ?
क्यों घबराना - अपनों से !
आँखे बंद करली है मैंने
अब तुम कुछ भी बोलो
सुनाई नहीं देगा।
राघव पुरोहित
08.01.2015
हमने महसूस किया है कि
हमारे सोचने का तरीका अलग है
इसीलिए हम दुनिया से थलग है
चुप रहना मजबूरी नहीं
आदत बन चुकी है
आदमी इंसान नहीं
चीज बन चुकी है
राघव पुरोहित
07.01.2015
ये भी अच्छा कहा -
माना सच नहीं बताना हमारी मज़बूरी है
लेकिन झूठ बोलना तो जरुरी नहीं है।
समझे क्या
इसलिए हम चुप रहते है।
राघव पुरोहित
07.01.2015
इसलिए हम चुप रहते है।
राघव पुरोहित
07.01.2015
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